देश के आसमान पर अगले साल से तीन नई एयरलाइंस के जहाज उड़ते दिख सकते हैं। उत्तर प्रदेश की शंख एयर के बाद अल हिंद एयर और फ्लाईएक्सप्रेस को नागरिक उड्डयन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मिल चुका है। अल हिंद एयर का संबंध केरल और फ्लाईएक्सप्रेस का तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से है। यह दोनों कंपनियां शुरुआत में दक्षिण भारत में और शंख एयर उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश के हवाई रूट पर फोकस करेगी।

 

हाल ही में आप ने इन एयरलाइंस से जुड़ी तमाम खबरें पढ़ी और सुनी होंगी। इनके मालिक कौन हैं और कब से संचालन होगा। किन-किन रूट में अपनी सर्विस शुरू करेंगी। एक सवाल यह भी उठता होगा कि आखिर एयरलाइंस कैसे शुरू होती है, इसकी प्रक्रिया क्या है? आज के आर्टिकल में इसे ही जानते हैं।

 

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पहले बाजार को समझना जरूरी

एयरलाइन शुरू करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए भारी भरकम बजट और एक बड़े तंत्र की जरूरत होती है। एयरलाइन शुरू करने से पहले एविएशन मार्केट को समझना जरूरी है। यह भी जानना अहम है कि किन-किन रूटों पर फ्लाइट की अधिक मांग है। यात्रियों की संख्या कहां ज्यादा है। अगर एयरलाइन शुरू की तो मुनाफा होगा या घाटा, क्योंकि एयरलाइन शुरू करने से भी ज्यादा कठिन काम उसे मुनाफे पर चलाना है।

 

बाजार को समझने के बाद फैसला लें कि कौन सी एयरलाइन शुरू करना अच्छा होगा? यात्री या कार्गो। जब एक बार सब कुछ साफ हो जाए तो एयरलाइन से जुड़े नियम, मानक और दिशा-निर्देशों को समझना होगा, क्योंकि इनके उल्लंघन पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। एविएशन मार्केट को समझने के बाद कंपनी का नाम, उसकी सेवा, विशेषता, कितने जहाज होंगे, कौन से विमान होंगे, क्रू सदस्य कितने होंगे, कौन-कौन से रूट में सेवा शुरू करनी है, फंडिंग कहां से और कितनी हो रही है, एयरलाइन चलाने के लिए पर्याप्त धन है या नहीं, इसका ब्योरा तैयार कर लें। एयरलाइन अंतरराष्ट्रीय होगी या घरेलू, यह भी साफ-साफ मेंशन करें।

 

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  • सबकुछ तय होने के बाद सबसे पहले कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के पास कंपनी को प्राइवेट लिमिटेड या पब्लिक लिमिटेड के तहत पंजीकृत कराना होगा। एक अनुमान के मुताबिक पंजीकरण की लागत 15,000 से 50,000 रुपये तक हो सकती है।

 

  • इसके बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय को अपनी एयरलाइंस से जुड़ा पूरा ब्योरा सौंपना होगा। मंत्रालय इसकी जांच करेगा और सबकुछ सही मिलने पर NOC जारी करेगा। 

 

  • अगले कदम के तौर पर नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) से एयर ऑपरेटर परमिट (AOP) हासिल करना होगा। यह प्रक्रिया चार चरणों में होती है। इसमें डेढ़ से 3 साल तक का वक्त लग सकता है। इस दौरान डीजीसीए तमाम मानकों की जांच करता है। किसी भी उल्लंघन पर परमिट देने से मना कर सकता है। इसमें अनुभव पायल और क्रू मेंबर से सुरक्षित हवाई जहाजों तक के प्रबंध की जानकारी देनी पड़ती है।

 

  • अभी काम यही नहीं खत्म हुआ। एयरलाइन को नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो से भी इजाजत लेनी पड़ती है। उसके बाद डीजीसीए विमान की उड़ान योग्यता प्रमाणपत्र जारी करता है। इसके अलावा विमानन बीमा, विमान प्रकार प्रमाणन और ध्वनि नियंत्रण प्रमाणपत्र भी लेना पड़ता है।

 

  • अगर एयरलाइन अंतरराष्ट्रीय है तो उसे अंतरराष्ट्रीय विमानन मानकों का पालन करना होगा। इसके बाद एयरपोर्ट पर एयरलाइन को स्लॉट आवंटित होगा। 

 

  • अगर लागत की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ लाइसेंस हासिल करने और कानूनी प्रमाणपत्र में 2 करोड़ रुपये तक लग सकते हैं। इसके अलावा विमान खरीदने, हैंगर, दफ्तर खोलने, एयरलाइन से जुड़े सॉफ्टवेयर, क्रू के प्रशिक्षण और उनके सर्टिफिकेशन पर करीब 90 करोड़ रुपये तक खर्च आ सकता है। हालांकि यह कंपनी के साइज के आधार पर घट और बढ़ सकता है।

 

  • यह सभी शुरुआती खर्च हैं। एयरलाइन शुरू होने के बाद रोजाना करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। पार्किंग, विमान के रखरखाव, कर्मचारियों के वेतन, सेल्स-मार्केटिंग, ईंधन और बीमा पर करोड़ों रुपये चुकाने होते हैं। सभी प्रमाण पत्र और लाइसेंस मिलने के बाद आपकी एयरलाइन उड़ान भर सकती है।   

 

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