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'लेफ्ट लोगों के लिए राइट नहीं...', न सरकार बची, न संगठन, वाम का काम तमाम

पश्चिम बंगाल में 3 दशक तक वाम दलों की सरकार रही, 2026 में एक सीट नहीं जीत पाई। केरल में भी कांग्रेस ने वाम दलों का काम तमाम कर दिया।

Kerala

केरल में वाम मोर्चा की विदाई हो गई है। Photo Credit: ANI

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किसी जमाने में पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरलम, वामपंथी दलों के लिए गढ़ कहे जाते थे, अब तीनों राज्यों से वामदलों की सरकार नहीं है। वामदलों की इकलौती सरकार केरल में थी, वह भी अब विदा हो गई है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) राज्य की सत्ता में दमखम के साथ आ रहा है, पिनराई विजयन सरकार की विदाई की राह साफ हो गई है।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने केरलम में भारी बढ़त बनाई है। दोपहर दो बजे तक के रुझानों के अनुसार कांग्रेस गठबंधन 89 सीटों पर आगे चल रहा है, जबकि LDF सिर्फ 39 सीटों पर ही बढ़त बना पाया है। 

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एंटी इनकंबेंसी पड़ी भारी, उखड़ गई वाम सरकार 

10 साल पुरानी सरकार के खिलाफ जनता में नाराजगी रही। ज्यादातर सीटों पर एंटी इनकंबेसी नजर आई। हार की यह बड़ी तस्वीर दिखा रही है कि देश में अब वामपंथी दल हाशिए पर हैं। लगातार यह पार्टी चुनाव हार रही है। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी दलों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा।

5 दशक बाद पहली बार लेफ्ट की सरकार नहीं

केरल में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली इस सरकार की हार के साथ ही देश में 5 दशक बाद पहली बार कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं रहेगा।

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बंगाल में भी साफ है लेफ्ट 

बंगाल में 2011 तक, लेफ्ट की सरकार रही, अब यह पार्टी, 2 सीट नहीं हासिल कर पाई है। 34 साल के शासन से लोग ऐसे ऊबे की ममता बनर्जी को चुना। ममता बनर्जी से डेढ़ दशक बाद ऊबे तो अब बीजेपी सत्ता में आ गई। लेफ्ट के प्रति लोगों के मन में कोई सहानुभूति नहीं। अब पश्चिम बंगाल में न तो कांग्रेस मजबूत बची, न लेफ्ट, यह चुनाव सिर्फ तृणमूल कांग्रेस बनाम भारतीय जनता पार्टी का ही रहा। 

कैसे सिमटते गए वामपंथी दल?

साल 2004 में लोकसभा में 59 सीटें जीतने वाले वाम दल, 2009 में 24, 2014 में 10 और 2019 में सिर्फ 5 सीटों पर सिमट गए। फिलहाल उनके पास सिर्फ 6 लोकसभा सीटें बची हैं। 

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क्यों वामपंथ से लोगों का मोहभंग हो रहा है?

वामपंथ से अब युवा प्रभावित नहीं हो रहे हैं। लेफ्ट के क्रांतिकारी सपने लोगों को पसंद नहीं आ रहे हैं। लेफ्ट में कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता बचा नहीं है। दुनिया बदल रही है, उदारीकरण का दौर है, वैश्वीकरण और निजीकरण के बढ़ते दौर में लोगों को साम्यवादी राजनीति पंसद नहीं आ रही है। 

दुनिया में भी अब वामपंथी राजनीति हाशिए पर है। मार्क्सवाद जिन देशों में है भी, वहां भी लोग इस विचारधारा से कब के दूर हो चुके हैं। चीन से लेकर रूस तक, साम्यवाद से ठीक-ठाक दूर हो चुके हैं। अब वहां तानाशाही बची है।  

न तो लेफ्ट के साथ मजदूर आ रहे हैं, न युवा, न किसान। वामपंथी दलों की लोकप्रियता लगातार घट रही है। बंगाल, बिहार से लेकर केरल तक, लेफ्ट, की विचारधारा अब लोगों को 'राइट' नहीं लग रही है। 


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