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गोवा: श्री लइराई मंदिर में जात्रा के दौरान भगदड़, 6 की मौत, कई घायल

शिरगांव के इस मंदिर में भक्त देवी की जात्रा के लिए उमड़े थे। अचानक भगदड़ मची और कई लोगों की जान चली गई। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

Lairai Devi temple

लइराई देवी मंदिर। (Photo Credit: Social Media)

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गोवा के श्रीगांव में शनिवार को लइराई देवी मंदिर में 'शीत देवी लइराई जात्रा' के दौरान हुई भगदड़ में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई और 15 से अधिक घायल हो गए। नॉर्थ गोवा के एसपी अक्षत कौशल ने हादसे पर कहा है कि घायलों को इलाज के लिए पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। घायलों का इलाज जारी है।

भगदड़ की वजहों के बारे में अभी तक कोई जानकारी सामने नहीं आई है। गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने घायलों से नॉर्थ गोवा जिला अस्पताल और बिचोलिम अस्पताल पहुंचकर घायलों से मुलाकात की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हादसे पर दुख जताया है और कहा है कि पीड़ित परिवारों के साथ उनकी संवेदना है। घटनास्थल से घायलों को अस्पताल लाया जा रहा है। विस्तृत ब्यौरे की प्रतीक्षा है।

सैकड़ों पुलिसकर्मी, ड्रोन, फिर भी हुआ हादसा

लइराई जात्रा की शुरुआत शुक्रवार को हुई थी। हजारों श्रद्धालु इस जात्रा में हिस्सा लेने आए थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए करीब 1,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था और ड्रोन का भी इस्तेमाल किया गया खुद मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, उनकी पत्नी सुलक्षणा, सांसद सदानंद शेट तनावड़े, और विधायक प्रेमेंद्र शेट व कार्लोस फरेरा भी इस आयोजन में शामिल हो चुके हैं। 

क्या है इस मंदिर की मान्यता?
लइराई मंदिर अपनी उत्तरी और दक्षिणी स्थापत्य शैली के मिश्रण के लिए प्रसिद्ध है। हर साल मई में श्रीगांव जात्रा का आयोजन इस मंदिर में किया जाता है। इस उत्सव में आसपास के गांवों से लोग आते हैं। लोग देवी लइराई की पूजा करते हैं, तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठान आयोजित कराए जाते हैं। 

क्या है लइराई मंदिर की जात्रा?
जात्रा के दौरान आधी रात के करीब, श्रद्धालु मंदिर के अंदर समूह बनाकर नाचते हैं। यहां गरबा जैसा आयोजन होता है। जब यह नाच अपने समापन की ओर होती है, तब एक व्यक्ति जिसे लोग चुनते हैं, वह जलते हुए आग जलाता है। जब आग की लपटें शांत पड़ जाती हैं, तब नंगे पांव लोग गर्म अंगारों पर चलते हैं।

श्रद्धालु देवी लइराई का नाम जपते हुए कोयलों पर दौड़ते हैं। यह अनुष्ठान जब पूरा होता है, तब लोग अपनी मालाएं बरगद के पेड़ पर छोड़कर घर लौटते हैं। जैसे ही सूर्योदय होता है, यह उत्सव खत्म हो जाता है। 

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