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काशी विद्वत परिषद लाया हिंदू कोड, शादी, तेरहवीं व दहेज पर बनाए नए नियम

काशी विद्वत परिषद के अनुसार ने 400 पन्नों की नई हिंदू आचार संहिता तैयार की है। आइए जानते हैं इसमें क्या बड़े बदलाव हुए हैं।

Image of Hindu marriage

सांकेतिक चित्र (Photo Credit: Canva Image)

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भारत में हिंदू समाज की परंपराओं और आचार-व्यवहार में सुधार लाने के लिए काशी विद्वत परिषद ने एक नई हिंदू आचार संहिता (Hindu Code of Conduct) तैयार की है। यह संहिता लगभग 400 पन्नों की है और इसे देशभर के धार्मिक विद्वानों, शंकराचार्यों, महामंडलेश्वरों और संतों से विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया है।

 

परिषद का यह मानना है कि आज के समय में विवाह, धर्म, परंपराएं और सामाजिक रीति-रिवाजों में काफी परिवर्तन आ गए हैं। कई ऐसी चीजें प्रचलन में आ गई हैं जो न केवल धर्म से दूर करती हैं, बल्कि समाज में तनाव और खर्च का कारण भी बनती हैं।

नई संहिता में क्या-क्या बताया गया है?

काशी विद्वत परिषद के अनुसार, यह संहिता 21वीं सदी में पहली बार इस तरह का गंभीर प्रयास है जिससे सनातन परंपराओं को बचाया जा सके और समाज में सुधार लाया जा सके। परिषद ने यह फैसला लिया है कि अब किसी भी प्रकार से दहेज लेना या देना धर्मविरुद्ध माना जाएगा। दहेज से जुड़ी सामाजिक समस्याओं को जड़ से समाप्त करने का प्रयास इसमें किया गया है। इसके साथ शादी-विवाह में होने वाले भारी खर्च और दिखावे को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया गया है। संहिता में दिन के समय वेदों के अनुसार सादे विवाह की सलाह दी गई है।

 

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नई संहिता में यह भी बताया है कि, अब मृत्यु के बाद होने वाले भोज को केवल 13 लोगों तक सीमित किया गया है। इससे फिजूलखर्च और सामाजिक दबाव से मुक्ति मिलेगी। संहिता में कहा गया है कि शादी से पहले की सगाई, प्री-वेडिंग शूट, संगीत आदि कार्यक्रमों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। इन्हें सनातन परंपराओं के विरुद्ध माना गया है।

 

बता दें कि जो लोग किसी कारणवश हिंदू धर्म छोड़ चुके हैं, उनके लिए वापसी का मार्ग अब सरल बनाया गया है। वह दोबारा हिंदू धर्म में शामिल होकर अपना गोत्र और नाम फिर से प्राप्त कर सकते हैं। यह प्रक्रिया बिना किसी बाधा के की जा सकती है। इसके साथ मंदिरों के गर्भगृह (अंदरूनी भाग) में केवल पुजारियों और संतों को ही प्रवेश की अनुमति दी जाएगी। इससे मंदिर की पवित्रता बनाए रखने का प्रयास है।

किस आधार पर बनी यह संहिता?

यह संहिता मनुस्मृति, पराशर स्मृति, देवल स्मृति जैसे प्राचीन धर्मग्रंथों के साथ-साथ श्रीमद्भगवद गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के विचारों पर आधारित है। देश के 70 से अधिक विद्वानों को 11 टीमों और 3 उप-टीमों में बांटा गया था। हर टीम में उत्तर और दक्षिण भारत से 5-5 विद्वान थे, जिससे कि यह दस्तावेज पूरे भारत के विविध विचारों को समाहित कर सके।

 

इस संहिता को अंतिम रूप देने के लिए देशभर के तीर्थ स्थलों पर 40 से अधिक बैठकें आयोजित की गईं। यह एक राष्ट्रीय स्तर पर समर्पित धार्मिक प्रयास है। इसके तहत 5 लाख से अधिक प्रतियों को दो पन्नों के सारांश सहित छापकर देशभर में बांटा जाएगा। यह संहिता अक्टूबर 2025 में औपचारिक रूप से जारी की जाएगी। इससे पहले शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य और अन्य प्रमुख संतों की स्वीकृति ली जाएगी।

 

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काशी विद्वत परिषद का उद्देश्य

परिषद के महासचिव राम नारायण द्विवेदी ने मीडिया को बताया कि यह संहिता खास तौर से उन सामाजिक बुराइयों और मानसिक तनावों को खत्म करने के लिए है, जिनका सामना आज का मध्यम वर्ग के हिंदू कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल की युवा पीढ़ी सनातन परंपराओं से दूर होती जा रही है और धर्म को कमजोर करने वाली ताकतें सक्रिय हैं। ऐसे समय में यह संहिता संस्कृति और धर्म को बचाने का प्रयास है।

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